धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार, धधक उठा यह धाम।ध्वस्त करो अब दुष्ट दलन, धीर धरो महाकाल॥”धधक धधक धधके दिशाएँ, धरा धधक धू-धू जले।ध्वस्त दंभ, ध्वस्त दानव, ध्वनि से गगन भी हिले॥धमक रहे शिव डमरू धारी, धक-धक कर चेतन करे।धक-धक कर गति भी रुके, धवल जटा जब चल पड़े॥”धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार, धधक उठा यह धाम।ध्वस्त करो अब दुष्ट दलन, धीर धरो महाकाल॥”
धरा ध्वस्त, नभ धूसरित, धूम्र हुआ संसार है।धारदार त्रिशूल धरा पर, धधक उठे संहार है॥ध्वजा उठाए, धीर शिव, धधक उठी जब आग है।धड़क उठे देव-दानव, ध्वस्त हुई अभाग है॥धधक-धधक कर चला समीरण, ध्वनि से गूंजे व्योम भी।धूल बने जब महाकाल के, ध्वस्त हुए सब दोष भी॥
“धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार, धधक उठा यह धाम।ध्वस्त करो अब दुष्ट दलन, धीर धरो महाकाल॥”
धक-धक धधक धधक शिव, धारा जब कंपाय है।धड़-धड़ धू-धू धूसरित, ध्वस्त होई अन्याय है॥ध्वनि शिव की धरा कंपाए, धूम्रभस्म जब काज है।धधक उठे तांडव ज्वाला, धीर बने सब लाज है॥धर्म ध्वजा पुनः लहराए, धैर्य धार शिव ध्यान में।धड़क उठा हर ह्रदय मनुज का, धरा पड़ी शिव पान में॥”धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार, धधक उठा यह धाम।ध्वस्त करो अब दुष्ट दलन, धीर धरो महाकाल॥”
धधक तांडव जब थमा, ध्वनि शांत बनी अब ध्यान में।धवल हुआ हर पाप सभी का, धरा गई अभिमान में॥धरा चरण में रखे कृपालु, धनी हुआ जो ध्यान करे।धीर बने जो शरण में आए, धवल दिशा का ज्ञान धरे॥धन्य हुआ वह मानव, जो धरा चरण शिव शंभु का।धूप बनी जो ह्रदय का अंध, धवल हुआ जब अंशु का॥
“धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार, धधक उठा यह धाम।ध्वस्त करो अब दुष्ट दलन, धीर धरो महाकाल॥””धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार, धधक उठा यह धाम।ध्वस्त करो अब दुष्ट दलन, धीर धरो महाकाल॥”
धक-धक धधक ध्वनि धूम्रधार